History (4)
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    बाबा साहेब अम्बेड्कर के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अनुयायियो ने बहुत मेहनत से अम्बेड्करी विचारधारा का झंडा बुलंद किया और अधिकांश लोगो का फोकस समाज और सांस्कृतिक परिवर्तन रहा. सत्ताधारियो ने महत्वाकांक्षी लोगो को प्रलोभन देकर उनकी राजनितिक विरासत को जरूर कुंद किया लेकिन अम्बेड्करी मिशन की ताकत उसका विचार और सांस्कृतिक परिवर्तन का भाव ही रहा. श्री भगवान दास, एल आर बाली, सदानंद फुलझले, एन जी ऊके, के जमनादास उस दौर के उन लोगो मे थे जिन्होने बाबा साहेब के साथ काम किया और उनके मिशन को आगे ले जाने मे बेहद बडी भूमिका निभाई. राजा ढाले ने दलित पैंथर्स के जरिये, कुमुद पावडे ने अम्बेड्करी नारीवादी अंदोलन के जरिये और विजय सुरवाडे ने अपने ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण के जरिए नई बातो को लोगो के सामने रखा और और अम्बेड्करी विचार धारा को बढाने मे बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया. 80 के दशक मे वी टी राजशेखर ने दलित वायस के द्वारा बहुजन आंदोलन को एक बेहद मज़बूत धार दी. भदंत नागार्जुन सुरई ससई, जो जापान से आये लेकिन भारत मे ही बस गये, ने बौद्ध गया आंदोलन के लिये बहुत बडी लडाई लडी. ष्री मनोहर मौली विश्वास ने बंगाल मे अम्बेड्करी साहित्य को मज़बूत करने मे बहुत बडी भूमिका निभाई है. श्री धर्म कीर्ति जी ने आगरा मे ऐतिहासिक रामलीला मैदान मे बाबा साहेब को सुना और वहा बुद्ध विहार के उद्घाटन के अवसर भी मौजूद थे. आज के दौर मे अम्बेड्करी विचारधारा की दिशा के एक बेहद महत्वपूर्ण आलोचक है आनन्द तेलतुम्बडे जिनका विस्तृत साक्षात्कार भी इस पुस्तक मे है. हिंदी मे यह पहला वाल्युम है और उम्मीद है इसके बाद की कडिया भी नये लोगो के साथ आयेंगी. इस पुस्तक मे प्रस्तुत हर एक साक्षात्कार इतिहास का एक दस्तावेज है और अम्बेड्करी-बहुजन आंदोलन की दशा और दिशा को समझने मे मदद करेगा.

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    a fantastic work in compiling Bengali language poetry (translated to English) written by nine poets – Dronacharya Ghosh (1948-1972), Murari Mukhopadhyay (1945-1971), Timir Baran Sinha (1949-1971), Amiya Chattopadhyay (1940/41-1971), Ashutosh Majumdar (1945/46-1971),  Tushar Chandra (1943/44-1971), Kalachand Dalal (1921-1972), Sudipto Bandyopadhyay {1952(?) – disappeared with encephalitis while underground)} and Saroj Dutta (1915-1971). The similarities between these men are that all of them had joined the Naxalite Movement in the late 1960s and that all of them have fallen martyrs to police action in the early 1970s during the rule of the United Front Government in West Bengal.

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    This book is a compilation of articles published by the author in different newspapers and magazines on issues relating to the marginalised communities of Odisha. He has a been part of people’s movements, rights based work and policy advocacy for building and inclusive Odisha by including the historically marginalised communities in the bottom of socio-economic strata who are left out in the ongoing development process and further pushed into the periphery. Their issues and problems get a very minimal space in media and state policy making process in spite of constitutional mandate to establish equality and ensure equal opportunity in all spear of social, economic and political life. Author has tried to highlight the gaps at a different level from policy to programme implementation and also suggested for possible intervention by state and other concern.

    This book will be used as an instrument in the realisation of the basic rights of the marginalised in Odisha by strengthening people’s movements and struggles and contribute to the process of building of an inclusive, democratic and vibrant Odisha.

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